Thursday, December 23, 2010

December ki sardi

तुम मिलते हो मुझे यादो में
मेरे बातो और तुम्हारे वादों  में
सर्दी के मौसम की वो कपकपी
एक प्याले से चाय पिने की जो लत थी
आधी रात के सन्नाटे मे वो बातें करना
वो दिसम्बर की सर्दी
और नए साल का स्वागत गाना
याद आटे हो तुम आज भी इन सर्दियो में
जब सुनसान राहों पर
तुम्हारे हाथो की गर्मी नहीं मिलती
चाय की चुसकिया भी ठंढी पड़ी रहती
मेरी ख़ामोशी भी हद में रहती
और भीगी सी ये सर्दी
तुम्हारे बगैर तरसती रहती
याद है तुम्हे वो
मैक डी का बर्गेर और वो चौपाठी की चाय
हर थेयेटर के शो मे जाना
वो दो पहिये पर धुल उड़ाना
और दोस्तों को झासा देकर
हर शाम मुझसे मिलने आना
वो कभी-कभी मेट्रो से जाना
और भीड़ मे धक्का खा कर
तुम्हारे बाहों में गिर जाना
वो छोटी-छोटी सी बातें
देखो बन गए तुम्हारी यादें
इस सर्दी में तुम साथ नहीं हो
फिर भी होती है तुमसे हर पल बातें
देखो दिसम्बर की सर्दी है आई
चलो फिर से एक-दूजे के हो जाये................................कीर्ति राज

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