Thursday, June 25, 2009

KAHAN


ना मिले उनका निशां
जाऊ तो जाऊ कहाँ
सुने सुने राहों पे
दर्द का मेरा जहाँ
ना मिले उनका निशां



आंधी के झोके चले
तरसे मेरे रेतो के किले
देखा न जिसको कभी
आखे तो अब तरस गए


माँलाओ मे गूथ गूथ कर
रखा है तुमको यहाँ
पर धागे भी अब उलझ रहे है
छूट रहा है मेरा जहाँ


ना मिले उनका निशां
जाऊ तो जाऊ कहाँ
सूखे पत्तो की बारिश
होती है मेरे यहाँ
धुप से तपती है ज़मीन जहाँ
सिमटी रहती हु मै वहां

ना मिले उनका निशां
जाऊ तोह जाऊ कहाँ
हस्ती है दुनिया सारी
और उजरता है मेरा जहा
विराग मै हँस हँस कर
जीने का आया समां

दर्द का मेरा जहाँ
ना मिले उनका निशां
जाऊ तोह जाऊ कहाँ

1 comment:

  1. बेहतरीन कविता है मित्र

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