Wednesday, April 28, 2010

क्या है ये शून्य


क्या है ये शून्य.......................
क्या आकाश की बस्ती मे बादलों का खोना


या जुलाई के मौसम मे बारिश का होना


या रात के सन्नाटे मे हर आँखों का सोना


या आँखों मे खवाब भर के शब्दों को पिरोना


क्या है ये शुन्य......................


सुखी मिटटी मे पानी के हर बूंद का खोना


या घने जंगल मे मकड़ी का जालो को पिरोना


या लहरों के पीछे हर लहरों का होना


या गिले रेट मे हर कीर्ति का बहना


क्या है ये शुन्य...........................


रात के सन्नाटे मे घरी की टिक-टिक का होना


या सुबह-सुबह चिरियो के गीतों का होना


या किसी तानसेन के ताल मे खोना


क्या है ये शुन्य...........................


भीर मे अकेला होना


या दूर एक सुनसान सड़क पर सोना


या रात-रात भर जाग कर अपनी हार पर रोना


या रो-रो कर फिर से सोना


क्या है ये शुन्य...........................


शारीर का मिटटी मे मिलना


या नए किलकारी का जन्म होना


ये जानकर भी उस चक्र मे खोना


या पाना या पाकर भी खोना


क्या है ये शुन्य..............................


पागलो की तरह शब्दों से लड़ना


या तोड़ मोड़ कर आशावो को जोड़ना


या आधी रात मे सड़क का सन्नाटे मे होना


और सन्नाटे के संग अपनी रूह का खोना


या पागलपन की बाते करना


या पागलपन मे जीना


क्या है ये शुन्य.............................


रातो मे जाग कर शब्दों से बाते करना


या अपने सवालो से शब्दों को ठगना


या शुन्य की तलाश मे शुन्य को खोना


क्या है ये शून्य..............................









Saturday, February 13, 2010

कैसे


कैसे तुम्हे मै भुलाऊ
तुम तो हर कोने मै बसते हो
कैसे तुमको मै बताऊ
तुम तो मेरे रूह को रचते हो
कैसे उन बिखरे मोतियो को समेटू
जो तुम्हारे स्पर्श के लिए
फर्श पर बिखरे परे
कैसे तोडू उस चादर की सिलवटो को
जो तुम्हारे स्पर्श की याद दिलाती है
कैसे सवारू उलझे लटो को अपनी
जिसे तुमने अपनी उंगलियो से सवारा था

कैसे हटाऊ बिखरे काजल को अपने आँखों से
कैसे छुपाऊ आचल को अपनी आहो से
जिसमे आज भी तुम्हारी खुसबू बस्ती है
कैसे सवारू उस कमरे को
जिसके हर कोने मे तुम बसते हो
वो मुरझाये कुचले सूखे मोगरे के फूल
आज भी उलझी लटो से उल्हज रहे है
उस मोमबत्ती की पिघली धार
आज भी तरस रही है जलने को
कैसे सवारू फिर से उस कमरे को
जिसके हर तिनके मे तुम बसते हो
कैसे तुमको मे छुपाऊ
कैसे तुमको मे भुलाऊ



Thursday, December 10, 2009

मेरा प्यार

अभी तो तुमने बारिश की फुहार और
ओस मे लिपटे हुए हरी-भरी पत्तियो का ऐतबार देखा है
अभी तो तुमने पेड़ो से छनते हुए उजली किरणों और
सूखे गिरते पत्तो की तिलमिलाती हुए चीखो का पैगाम देखा है
मेरा प्यार कहाँ देखा है|

अभी तो तुमने डूबता सूरज की लालिमा और
रेत मे छ्त्पटती हुए बूंदों का आखिरी पुकार देखा है
अभी तो तुमने काली रात मे चिलमन की रोशिनी मे
मेरा हाथो का स्पर्श देखा है
अभी तो तुमने सामने अली छत से उन दो
अंजन नजरो का दीदार देखा है
मेरा प्यार कहाँ देखा है|

अभी तो तुमने बारिश मे नहाती हुए
उसके पैरो की पाजेब देखि है
अभी तो तुमने उसके थिरकते बदन के कमर का तिल देखा है
अभी तो तुमने उसका जलता हुआ दिल और पिघलते मोम का दर्द देखा है
मेरा प्यार कहाँ देखा है

अभी तो तुमने उसके टूटे सपने और
उजड़े आशियाने मे दो चिडयों का बसेरा देखा है
और उस पारदर्शी परदे से उसकी मुस्कराहट देखि है
और उस मुस्कराहट के पास सूखे आसुओ की लकीर देखि है
मेरा प्यार कहाँ देखा है

अभी तो तुमने उसकी कलम की धार
और उसके शब्दों का घर देखा है
अभी तो तुमने उसके हाथो पर बंधी मोल्ली
गले का रुद्राक्ष और माथे का चन्दन देखा है
मेरा प्यार कहाँ देखा है

अभी तो तुमने उसकी शरारती आखे
और उसकी इतराती बाते देखि है
अभी तो तुमने उसकी अटखेली
और उसकी बातों का तीखा ताना देखा है
मेरा प्यार कहाँ देखा है

Monday, September 28, 2009

तन्हाई

आँखों की कशिश शर्मा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
गुमशुदा है दिल की तमन्ना
या तमन्ना अपनी छुपा रही है
सहमी सी देख रही है तुमको
या तुम्हारी नजरो से खुद को छुपा रही है
शर्मा रही है या घबरा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
तुम्हारी शीतल छुअन
एहसासों को जगा रही है
आंखे बंद करके प्यारे लम्हे को सजा रही है
आगोश मे आने को हर लम्हा
तिल-तिल कर बिता रही है
तुम्हारे स्पर्श की बाबरी
अपना प्यार बढा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
बेसुध सी हुए पड़ी है
आंखे तो सोना चाहे
पर नींदे कहाँ आती है
यादो के यादो मे
अपने दिल और रात बिता रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
आँखों से आँखों के मिलन मे
आँखों की कशिश शर्मा रही है
उनके यादो मे डूबी बाबरी
खुद को कितना सजा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है

Saturday, September 19, 2009

मेरे दिल की यही कवायद है

मेरे दिल की यही कवायद है
जो मेरा नहीं है क्यों उसकी चाहत है
भ्रम की दुनिया मे जीती हू
या भ्रम बुन रखा है अपने इर्द-गिर्द
जानती नहीं मै ये फिर भी क्यों उसकी हसरत है
कराह रहा है दिल मेरा या दिल की यही आदत है
भाग रही हू मै तुमसे या नियति की यही चाहत है
खामोश हू मै लेकिन गुफ्तगू है दिल मे कई
बोलू कैसे उसको मै टुकरो मे मिलती है मुझे ज़िन्दगी
रोज़ होती है खुद से कुछ खास बाते
ढूंडटी रहती हू हर रोज़ उनकी फ़रियादे
फरिस्तो की दुनिया मे रहते है वो
और हम तो ज़मीं के भी न लायक है
खौफ होती है मुझे अपनी ज़िन्दगी से
फिर कैसे उन्हें इस खौफ का हिस्सा बनाये
वो नहीं है हमारे फिर क्यों उनकी चाहत है
खुशियो की आदत नहीं है हमें
फिर क्यों आप हमें खुशियों मे नहलाते है
कुर्बत की चाहत नहीं है हमें
फिर क्यों हर रोज़ एक सपना दिखाते है
किश्तों-किश्ती मे मर रहे है हम
ज़िन्दगी भी नहीं है मेरे संग
फिर क्यों जीने की हसरत जगाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
क्यों ज़माने मे ऐसा होता है
जो दिल के पास हो दिल से दूर वही होता है
खुशनसीब है वो जो तन्हाई के संग जीते है
हमारी बेबसी तो देखो हम तो भीर मे भी तनहा होते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो देते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो खोते है
और हम बेबस तो पाकर भी खोते है
रेतो का घरोंदा है मेरा
क्यों इसमें बसेरा ढूंडते हो
हम तो पानी मे बह जाएंगे
फिर से साए सा खो जाएंगे
क्यों दिल पर दस्तक दाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
मेरे दिल की यही कवायद है

Sunday, September 6, 2009

उनकी आवाज़


सागर की लहरे गोते लगा रही थी
संग मे चिडिया भी गुनगुना रही थी
आकाश भी बादलों को जगा रही थी
बादल भी झूम-झूम कर मदबर्षा करा रही थी
फिर भी उनकी आवाज़ तमन्नाओ को
जगा रही थी|
पहारो से झरने नदियो मे डुबकिया लगा रही थी
संग मे कोयल भी गीत सुना रही थी
सर्द हवाए गर्दनों पर झोके लगा रही थी
एहसासों के सुध मे खोई हर मौसम गा रही थी
फिर भी उनकी आवाज़ तमन्नाओ को
जगा रही थी|
भीड़ की चहल-पहल सबका मन बहला रही थी
मैखाने की शायरी हर समां बना रही थी
खामोशी के हर पल नगमे सुना रही थी
प्रेम मे डूबी मीरा अपनी तृष्णा बुझा रही थी
फिर भी उनकी आवाज़ तमन्नाओ को
जगा रही थी|

Tuesday, September 1, 2009

चिराग


चिराग-ऐ-रोशिनी के लौ की कसम
गरज न होती तेरी तो बुझा देते तुझे हम
दोस्ती का वास्ता तू देता रहा हरदम
और हम नाअक्ल समझे तू खुदा का है हमदम
तेरे खुवाबो की हकीक़त बाया करते रहे हम
और जनाज़ा निकलता रहा हमारे खुवाबो का सनम
काली रातो मे थमा तेरी रोशिनी का दामन
और उस रोशिनी की खातिर जला दिया तुने मेरा दामन
हम तो जल कर भी तेरा घर करते रहे आबाद
बस तुने ही हमारी मुरादों को कर दिया बर्बाद
मेरे अंधेरो मे बस रह गया वो चिराग
जो दिलाता है हमें तेरी हम्दर्दगी की याद
या जताता है हमारे बेबसी की औकाद
चिराग-ए-रोशिनी के लौ की कसम
गरज नो होती तेरी तो बुझा देते तुझे हम