Wednesday, March 14, 2012

ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी


ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी
फिर भी कुछ है कमी
कुछ बिखरे पन्ने जोरे है
कुछ छूटे राहें  मोरे है
फिर भी ज़िन्दगी है थमी
ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी

बातें मेरी ख़त बन रहीं है
सुनने को कोई भी नहीं
बारिश में बैठे एहसासे भीग रही है
सुध लेने की खबर नहीं
ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी

ब्यस्त हो तुम अपने आशियाने में
मेरी न कोई कमी
मुर के देख लो एक बार
शायद हमारी यादें
अब भी कहीं वहीँ पड़ी
ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी

आँखें नम होती थी पहले
अब तो वो भी नमी नहीं
मिलने आ जाते थे तुम
जब याद आती थी मेरी
अब तो वो भी वजह नहीं
ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी

न जाने  कहाँ खो दिया है तुमको
घुटती हूँ ऐसे भीतर
जैसे खो दिया  हो खुद को
खुद से दुबारा मिलने की एक आस थी मन में
तुम्हारे जाने  से वो ख्याल भी सो गई   
मैं फिर से तनहा सी हो गई
थम गई है ज़िन्दगी
ज़र्रा ज़र्रा ये ज़िन्दगी

रचनाकार : कीर्ति राज

Wednesday, May 4, 2011

तुम हो तो

तुम सपना हो तो फिर एक अतीत हो
तुम सुबह हो तो फिर मेरी उम्मीद हो

तुम रात हो तो सपनो का दीप हो
तुम सुबह हो तो फिर एक ओझल संगीत हो

तुम अमावस्या हो तो फिर काली रात हो
तुम पूर्णिमा हो तो फिर चांदनी की बरसात हो
तुम सावन हो तो खुशियों का उमंग  हो 
तुम बारिश हो तो फिर इन्द्रधनुष का रंग हो

तुम इंतज़ार हो तो मिलन का ऐतबार हो
तुम मिलन हो तो फिर मंजिल का द्वार  हो

तुम थोडा हो तो अंश हो मेरा
तुम भूत तो फिर भविष्य हो मेरा

तुम हो तो ...........कीर्ति राज
 





Friday, March 18, 2011

दर्द

                                                      
मेरे जीवन का सारांश है ये दर्द
मेरे स्नेह का प्रमाण है ये वर्ष 
कितनी खुबसूरत है ये आसुओ की माला
कितना नायाब है ये विरह का रोग 
फिर क्यों कहते हो मेरे दर्द को शोक

आँखों पर पर्दा है सबके
या अनदेखा करते है लोग
ये दर्द ही तो एक ज़रिया है 
जो रखता है तुम्हे हर ओर

लोग कहते है 
ये मेरा पागल मन है
मेरी दीवानगी और मेरी आंखे नम है
लेकिन जब भी पूछती हु खुद से
तो अक्सर कहते हो तुम 
ये तुम्हारा नहीं दुनिया वालो का भ्रम है  

कितनी रम गई हूँ इस दर्द में
कितना ख़ूबसूरत एहसास है ये
लगता है जैसे पा लिया हो
तुम्हे फिर से
 
कितने पागल है वो लोग
जो दर्द को खुशियो से तोलते है
इस दर्द में इतनी तृष्णा है
की जितनी मै डूबती जाती हूँ
उतने ही पास तुम्हे पाती हूँ........ 
Written by: Kirti Raj


 
  
 
 

Tuesday, February 8, 2011

''ज़िन्दगी''






''ज़िन्दगी'' पिरोती है मोती
या हमारे भीतर है होती
कहते ज़िन्दगी संसार है
या रस्मो,उत्सव का परिवार है......

ये समंदर लगती है मुझे
डरती हूँ कहीं डुबो न दे
तो कभी इसमे लगाती हूँ गोते
ये हवाए मेरी उम्मीदे उड़ाते
जब ये धूप मेरी हिम्मत पछाड़े
तब ''ज़िन्दगी'' को कर देती हूँ आगे ......

लोग ढूंढ़ते है इसे इर्द-गिर्द
क्यों नहीं अपने भीतर समाते
क्यों नहीं ये समझ पाते
ये ''ज़िन्दगी'' नहीं हम है
जो खुद को हसाते और खुद को रुलाते.....

अपना रुतबा लोग बड़ा  दिखाते
पर हम इंसान बनने का जतन लगाते
''ज़िन्दगी'' एक अध्याय है
कभी  हम सीखते और सिखाते........

Thursday, December 23, 2010

December ki sardi

तुम मिलते हो मुझे यादो में
मेरे बातो और तुम्हारे वादों  में
सर्दी के मौसम की वो कपकपी
एक प्याले से चाय पिने की जो लत थी
आधी रात के सन्नाटे मे वो बातें करना
वो दिसम्बर की सर्दी
और नए साल का स्वागत गाना
याद आते  हो तुम आज भी इन सर्दियो में
जब सुनसान राहों पर
तुम्हारे हाथो की गर्मी नहीं मिलती
चाय की चुसकिया भी ठंढी पड़ी रहती
मेरी ख़ामोशी भी हद में रहती
और भीगी सी ये सर्दी
तुम्हारे बगैर तरसती रहती
याद है तुम्हे वो
गरम समोसे और वो चौपाठी की चाय
हर थेयेटर के शो मे जाना
वो दो पहिये पर धुल उड़ाना
और दोस्तों को झासा देकर
हर शाम मुझसे मिलने आना
वो कभी-कभी भीड़ में रहकर 
तुम्हारा स्पर्श पाना और
तुम्हारी  बाहों में गिर जाना
वो छोटी-छोटी सी बातें
देखो बन गई  तुम्हारी यादें
इस सर्दी में तुम साथ नहीं हो
फिर भी होती है तुमसे हर पल बातें
देखो दिसम्बर की सर्दी है आई
चलो फिर से एक-दूजे के हो जाते ................................कीर्ति राज

Tuesday, October 26, 2010

दस्तक

सुलग रही थी सासे मेरी
धधक रहा था तन मेरा
आंखे तरश  रही थी बारिश को
पर लगा रखा था तुमने पहरा
मौसम कर रही थी अटखेली
कभी बदलो का बसेरा देती
तो कभी धूप की किर-किरी
मचल रहा था मन मेरा
कब होगी बूंदों की बर्ष
और डूबेगा तन मेरा
जब हवाओ ने जुल्फों मे घुस कर
की थोड़ी सी मस्ती
बूंदों को चखने के लिए
प्यास मेरी और बढ़ी
गा रहा था बादल और
उस सुर पर थिरक रहे थे मेरे पैर
उस जंगल मे चहक रही थी
डर को सरे भूल गई थी
आगोश मे लेने को पुरे अम्बर को
बाहे मेरी बहक रही थी
जब छन से गिरी पहली बूँद तन पर
तृष्णा कुछ ऐसे बुझी
जैसे रेतो  को मिले बारिश की लरी
सारा अम्बर सजने लगा और
दुनिया मेरी बदल गए
टूटी-फूटी सी ज़िन्दगी मे
तुमने जब दस्तक ते दी
 
 
 
 
 

तेरी चाहत है मुझको

तेरी चाहत है मुझको
तेरे होने से राहत है मुझको
कुछ मिलो की दूरिय
भले है हमारे बीच
लेकिन तेरे छुअन की इनायत है मुझको
 
मेरे साँसों की गर्मी कहती है कुछ मुझसे
शायद तेरे रूहों की आदत है मुझको
तेरे यादो मे बहे आंसू
कहते है कुछ मुझसे
शायद तेरे सहारे की ज़रूरत है मुझको
 
चलती हू जब भी सुनसान रास्ते पर मै
तो मेरी ख़ामोशी कहती है कुछ मुझसे
शायद तेरे कदमो की आह्ट है मुझको
तेरे होने से कितनी राहत है मुझको
 
देखती हू जब भी खुद को आएने मे
महसूस होती है चाहत मुझको
तेरे परछाइ के होने की सोहबत है मुझको
तेर होने से कितनी रहत है मुझको
 
हर रात मुझको लगती है वो रात
शायद तेरे एहसासों की इनायत है मुझको
मेरे रोम-रोम मे बसते हो तुम
मेरी ज़िन्दगी जन्नत से नहीं है कम
तेरे होने से कितनी रहत है मुझको
 
गम-सुम सी थी मै पहले
पर बाबरी हो गई  हू
आज-कल तेरे प्यार मे
हस्ती हू गति हू नज्मे बनती हू
गर्मी भी लगती है सावन मुझको
शायद तेरे प्यार की चाहत है मुझको
तेरे होने से किनती रहत है मुझको